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Harun Ansari

16-04-2020

स्वामी विवेकानंद जी का जीवन दर्शन

15 अगस्त 1886 को स्वामी रामकृष्ण परमहंस इस नश्वर संसार को अलविदा कह देते हैं । इसके बाद माँ शारदा कामारपकुर को प्रस्थान कर जाती हैं और अन्य शिष्य भी परिव्रज्या पर निकल जाते हैं। स्वामी विवेकानंद भ्रमण करते करते कोटा राजस्थान पहुँचते हैं और किसी मुस्लिम वकील का आतिथ्य को स्वीकार करते हैं। कोटा शहर के सम्भ्रांत विद्वत समाज को स्वामी जी के मुस्लिम वकील के यहाँ आतिथ्य स्वीकार की बात का पता चलता है और वे वकील के घर पहुँचते है ।
उनमें से एक विद्वान ने स्वामीजी से कहा, ‘आप एक हिंदू संन्यासी हैं और ये वकील मुसलमान। इनके बच्चे आपके बर्तन, भोजन इत्यादि को छू देते होंगे। यह शास्त्र परंपरा के विरुद्ध है।’
स्वामीजी ने हंसते हुए कहा, ‘मुझे शास्त्र और परंपरा की चिंता इसलिए नहीं है कि संन्यासी सभी वर्णाश्रम बंधन से ऊपर और नियमों से परे होता है। परंतु मुझे आप जैसे अल्पज्ञ और धर्ममोहित परंपरावादी से अवश्य भय है।’ वह व्यक्ति स्वामीजी के मुख की ओर देखता रहा गया।